एक ” Slow” बच्चे की माँ !! by Shweta Acharya Vyas

जब नन्हें के इस दुनिया में आने की खबर सुनी,उस पल से अपने ध्यान का केंद्र उसे ही बना लिया। क्या उसके लिए अच्छा है,क्या बुरा? उसकी सेहत को क्षति पहुंचाने वाली हर चीज़ से मैं भी दूर और अपने घर वालों को भी दूर कर दिया। कोई नकारात्मक बात जिसका असर मुझ पर हो ,ऐसी कोई बात ना मैं करती ना किसी को करने देती। शायद हर ‘ नई माँ’ के जीवन में ये पल आये होंगे और बहुत प्यार से आज भी वो उन पलों को सहेजती होंगी,जैसे मैं करती हूँ।

9 महीने के बाद का एक-एक दिन जैसे ज़िन्दगी की किताब पर खूबसूरत पन्ने जोड़ता जा रहा है। उसकी पहली हर चीज़ पन्ने की पहली पंक्ति पर कब्ज़ा जमाये हुए है। उसके कदम पड़े और मैं और भी संवेदनशील और भी भावुक होती चली गयी और कहते है; भावुक इंसान को बड़ी आसानी से काबू कर लेता है ” डर”।

“3 महीने का हो गया,पलटता नहीं ?” पहला डर

“6 महीने का हो गया, बैठता नहीं” दूसरा डर

” 11 महीने का हो गया ,चलता नहीं?” तीसरा डर

” 2 साल का हो गया ,बोलता नहीं?”

अभी जो चल रहा है वो डर!!!😉 हर कदम,हर पड़ाव एक नया डर लाया।मेरा बच्चा अच्छे से नहीं बढ़ रहा क्या,वो अपनी उम्र के हिसाब से पीछे है क्या,ऐसे सवालों का घेराव हर कदम हुआ। गर्भावस्था में मैंने ही उसका ख्याल नहीं रखा,शायद कुछ कमी रह गयी होगी मालिश में,मेरी अनुवांशिक गुण के कारण ऐसा है….और ना जाने क्या क्या। ऐसा कोई कारण नहीं होगा जिसे मैंने उसके हर हलचल में हुई देरी का कारण ना ठहराया हो। पर सच कहूं, जैसे जैसे समय निकलता गया, उसकी हरकतें और निखरती चली गईं। लगातार मालिश पर भी वो पलटी नहीं खाया लेकिन जब वो लेटे लेटे हंसता,वो हंसी मेरी परेशानी भुला देती।

वो चाहे 7 महीने में बैठा,लेकिन बैठे-बैठे आहिस्ते से सरक के मेरे पास आकर मेरा दुपट्टा अपने मुंह में खा लेना,उसका नहीं बैठ पाने शुरू करना भुला देती।

अचानक से चलकर मेरे पास आ जाना उसका पहली बार, और गिरने पर मुझे पकड़ कर फिर खड़े होना,बहुत होता था मेरी ” नई मां” की चिंता को दूर करने के लिए।

और आज भी जब वो बोलने में उतना स्पष्ट नहीं है ,मेरे अंदर का विश्वास,मेरे अब तक के अनुभव और हर पल मेरा बढ़ता यकीन ,यही कहता है

हर बच्चे का अपना एक तरीका होता है बढ़ने का,अपने वातावरण में खुद को ढालने का,अपनी भावनाओं को अपने माध्यम से हमें बताने का। ज़रूरी नहीं,जैसे पड़ाव,जो सीमाएं हमने और प्रकृति ने बनाई हैं,उसी हिसाब से हमारा बच्चा बढ़े। हर बच्चे के विकास की तरफ बढ़ने की ,बड़े होने की अपनी एक प्रक्रिया है,क्यों हम उस स्वाभाविक प्रक्रिया को अपने आप ही होने दें। हर  माँ अपने बच्चे को अच्छा देना चाहती है,उसकी क्षमताओं से अधिक वो अपने बच्चे को ला कर देने  साहस रखती है। अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ती उसे सीखाने में।

बस वो खुश है,सही से खेल रहा है ,खा रहा है,अपनो भावनाओं को किसी ना किसी माध्यम से दर्शा रहा है;उतना बहुत है हमें हमारी चिंता से मुक्त करने के लिए।कोई जल्दी कोई देर से,कोई चटक कोई ढीला,कोई गोरा कोई काला,कोई लंबा कोई छोटा………लेकिन आखिर लक्ष्य तो उसे एक अच्छा इंसान बनाने का ही है ना!!

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