Thu. Sep 19th, 2019

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5 पैसे की नौकरी : Blog by Shweta Vyas

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औरत को आदिकाल ( मुझे मालूम सबसे लंबा समय) से घर की सृजनहार को उपाधि दी गयी है। “गृहिणी” , ” गृहलक्ष्मी” , “लक्ष्मी” नाम से संबोधित होने वाली ये प्रजाति असल मायने में अपने इन संबोधन को खुद ही ध्वस्त करती आई है।  

अपने बारे में सबसे बाद में सोचना, बच्चे को जन्म देना,घर संभालना,बड़ों की ज़रूरतों का ध्यान रखना,बुज़ुर्गों की देखभाल करना,आदि आदि आदि…..और इस आदि का कोई अनादि नहीं। जब यही औरत घर के पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर चलने की कोशिश करती है तो केंकड़े की तरह वही हमारी टांग खींचने लगेंगी।

हालांकि मर्द प्रजाति के भी कुछ सदस्य इस काम को करने में बड़ी दिलचस्पी रखते हैं लेकिन मुख्य योगदान महिलाओं का होता है।

जब तक हम किसी के हिसाब से चलें तब तक हम उनके दोस्त,हितैषी, प्रिय रहते हैं जब हम कुछ करने लगें तो वही सारे विशेषण ठीक विलोम हो जाते हैं।

2 साल के बच्चे को छोड़कर नौकरी करना,कोई छोटा निर्णय नहीं था मेरे लिए। जिस दिन चयनित होने का फ़ोन आया था उस दिन सबसे पहला वाक्य जो मैंने सोचा था यही था, ” नहीं ! विहान अभी छोटा है! और मौके आएंगे!”

शाम होते घर पर फ़ोन लगाया। सास ससुर को बताया कि आज ऐसी बात हुई है और मुझे नौकरी के लिए बुलाया है। तो दोनों का रिएक्शन देखकर हैरान रह गयी।

” तो क्या हुआ! हम लोग हैं ना । विहान को हम देख लेंगे। तुझे मौका मिला है तो छोड़ मत। वैसे भी बहुत बार बहुत कारणों की वजह से बहुत मौके छोड़ दिये तूने। एक बार आगे बढ़ फिर देखा जाएगा।”

खुद जिस कारण के लिए मना कर दिया उसके लिए सास ससुर समर्थन कर रहे हैं? अभी 2 साल का पूरा होने में भी थोड़े महीने बाकि है, कैसे अकेला छोड़ कर जाऊँ उसको। घर पर उसको कौन रखेगा? 

इन सब सवालों के जवाब मेरे पास नहीं थे पर मेरी सास के पास थे। मेरी माँ के पास थे। उन्होंने मेरी हिम्मत बढ़ायी। आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। 

और केवल बातों से ही नहीं उन्होंने सचमुच वो करके भी दिखाया। वो खुद विहान को रखने के लिए मुम्बई आयीं। मेरे ससुर जी ने अकेले रहना स्वीकार किया। मुंबई के चाल ढाल को समझ हर कदम मुझे एक नई शक्ति का स्त्रोत दिया। ठीक विपरीत, नौकरी करने से पहले जिन लोगों के बीच समय निकलता था वो अपने स्वर बदलने लगे थे धीरे धीरे। 

” 5 पैसे के पीछे भाग रही है,एक बार बच्चे को देख लेती। पैसों का क्या है?” ( यकीन मानिए ये उसने कहा जो खुद अपने बच्चों को सही दिशा में ढालने के लिए बड़ा संघर्ष कर रही है )

” बच्चे को फिर हमेशा मां की कमी महसूस होती रहेगी। बेचारा बच्चा!”

और पता नहीं कितना कुछ। नौकरी करने वाली माँ और घर पर रहकर घर सहेजने वाली मां की ममता में कोई अंतर नहीं होता जहां तक मुझे लगता है। मैं एक नौकरी पेशा मां के घर में बड़ी हुई हूँ और मेरे पति गृहिणी मां के बेटे हैं लेकिन हम दोनों की परवरिश में ऐसा कोई अंतर जान नहीं पड़ता। 

नौकरी करना या नहीं करना( या हर वो फैसला) हर मां का अपना निर्णय है और उस पर अमल करना उसका अपना फैसला है। हर फैसले का आयाम पैसा नहीं होता, नौकरी करना अपने आप में खुद को नई नई चुनौतियों के लिए तैयार करना भी है।

हम अपने दृष्टिकोण को केवल इतना बदल सकते हैं कि हर औरत के जीवन का फैसला उसे लेने का अधिकार दें। उसने घर पर रहना चुना है या बाहर काम करना। उसने शादी के बाद भी पढ़ना चुना है या घर पर खाना बनाना।उसने देश की सेवा करना तय किया है या समाज की गंदगी से अपने तरीके से लड़ना।उसकी भावनाओं का सम्मान करें। उसके फैसलों की इज़्ज़त करें। केवल नौकरी ही नहीं ,जहां जहां भी वो अपनी राय और मत दे ,उसे समझने का प्रयास कर हमेशा उसे आगे बढ़ने का प्रोत्साहन दें। और ये बिल्कुल अचूक सत्य है कि उसका कोई भी फैसला परिवार,समाज,बच्चों,देश के अहित में नहीं होगा।

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