Parenting

अब बड़ी हो गयी हूँ

अब बड़ी हो गयी हूँ,
किसी की बीवी, किसी की माँ बन गयी हूँ.


अब बड़ी हो गयी हूँ, अब अपनी ही ग़लती पर पापा से नाराज़ नही हो सकती,
अब तो दूसरों की ग़लती पर भी, कभी कभी मैं ही झुक जाती हूँ.


अब बड़ी हो गयी हूँ, माँ के हाथ का स्वादिष्ठ खाना बिस्तर में ही नही खा सकती,
अब तो बीमार हूँ, तब भी सब काम पहले करती हूँ.


अब बड़ी हो गयी हूँ, भाई से नयी नयी फरमाइश नही कर सकती,
अब तो सब की खुशी, सब की ज़रूरत अपने से पहले पूरा करती हूँ.


क्या मजबूर हूँ? क्या कोई ज़बरदस्ती है? नही – बस बड़ी हो गयी हूँ.
कोई मलाल नही, कोई शिकायत नही है,
जिनके लिए सब करती हूँ वो जान से भी प्यारे हैं.


जो प्यार माँ ने मुझे दिया, जिस लाड़ से सबका ध्यान रखा,
वही अब मैं भी करती हूँ, अब बड़ी हो गयी हूँ.

पर कभी कभी थक कर बैठ जाती हूँ,
दिन भर की दौड़ में दो पल को रुक जाती हूँ.


कुछ पल आँख मूंद कर माँ को याद करती हूँ,
पापा कैसे सिर दबा देते थे, उस एहसास को ही जी लेती हूँ.
भाई कैसे बिना हँसे रहने ही नही देता था. यही सोच कर हँस देती हूँ.


फिर सब याद करके मुस्कुरा देती हूँ,
फिर लग जाती हूँ अपनों का ख़याल रखने में.
अब बड़ी जो हो गयी हूँ.

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