Parenting

सलाह के नाम पर कितना आंकोगे एक माँ को

कुछ दिन पहले एक अजीब सा वाकिया हुआ. एक माँ ने फ़ेसबुक पर एक ग्रूप पर ग़लती से यह पूछ लिया की मेरा ढाई साल का बेटा स्कूल का होमवर्क नही करता मैं क्या करूँ? बात इतनी सी थी के वो ये लिखना भूल गयी की जब उसने होमवर्क लिखा तो उसका मतलब, रंग भरना ओर सीधी, टेढ़ी लाइनें खीचना था बस. कुछ बड़ी बात नही है. आज कल बहुत बच्चे प्ले स्कूल जाते हैं ओर उसमें ग़लत नही है जब तक की कोई बच्चा खुश है, कुछ नया सीख रहा है.

हैरानी की बात यह थी की उसके सवाल का जवाब प्यार से देने की बजाए बहुत सारी औरतें उसे आंक रही थी. स्कूल क्यू भेज रही हो, अभी से एग्ज़ॅम भी दिलवा दो ना, बच्चे को बचपन नही जीने दे रही… मैं हैरान थी ये सोच कर के इन में से एक दो ऐसी भी औरतें थी जो अपने आप को नारी शक्ति की सपोर्टर मानती हैं.


बात ये नही थी की उस माँ का सवाल ग़लत था, की सही था, बात थी की कितने लोगों को इतना गुस्सा क्यू आ गया भाई.


सब का जीवन अलग होता है, सब ज़रूरतें ओर मजबूरियाँ अलग होती है. अगर एक माँ ऑफीस जा रही है, और, उसने ये सोच लिया की घर में टीवी देखने की बजाए बच्चा प्ले स्कूल जाकर तोड़ा खेलेगा, कुछ सीखेगे तो भाई ऐसा क्या पहाड़ टूट गया. बेचारी को समझना पड़ा की मैं नौकरी करती हूँ और प्ले स्कूल इसलिए चुना की बच्चा साथ के बच्चों के साथ खुश रहे.


अब इस साधारण सी बात पर मैं जानती हूँ की बहुत लोग क्या कहेंगे:
१. आजकल की मायें बच्चों के साथ रहना ही नही चाहती. स्कूल भेज देती है की खुद आराम से टीवी देखें.: तालियाँ, ऐसी सोच रखने वालों के लिए. मेरी बेटी, डेढ़ साल की उमर में डे केर गयी, सवा दो में प्ले स्कूल, और चार साल की उमर में एल के जी. चाहे कोई कुछ भी बोले, मैं जानती हूँ, की मेरी बेटी को मैने बहुत प्यार दिया है, भरपूर समय दिया है. अपनी टीचर्स की प्यारी है, और एक बहुत ही खुश बच्ची है वो.


२. डे केर में आए दिन न्यूज़ आती है फिर भी इन औरतों को डर नही लगता बच्चों को छोड़ आती है: भाई न्यूज़ तो स्कूल की भी आती है, कॉलेज की भी, घर की भी. पर हर चीज़ देख संभाल के निर्णय लेते हैं ना. या उस माँ से ज़्यादा आप को चिंता है? क्या लगता है की वो देख कर, समझ कर नही चुनती होगी, या फिर भी मन में डर नही होता होगा, या हर दिन नज़र नही रखती होगी? कितना आसान हो जाता है लोगों के लिया ये बोलना के सब छोड़ दो.


३. बच्चे को डे केर भेज देते है, बेचारे बच्चे को माँ का प्यार कहाँ मिले: हे भगवान! चाहे एक माँ घर में रहे चाहे ऑफीस जाए, एक बात समझ लो की हर माँ अपने बच्चे को जान से भी ज़्यादा प्यार करती है. और ये भी जान लो की किसी भी बच्चे को. ..किसी भी बच्चे को उसकी माँ से ज़्यादा प्यार कोई नही करता, कोई भी नही. तो अपनी चिंता अपने तक रखो.


४. पता नही कैसे मन लग जाता है इन औरतों का ऑफीस में बेचारे बच्चे को डे केर में छोड़ कर: मान लगता है, ओर नही भी. जब ज़रूरत समझ आती है, या एक लक्ष्य सामने दिखता है तो काम में मन लगता है. फिर अचानक बच्चे की फोटो फोन में देखते हैं, याद आती है, फिर काम करते हैं, फिर किसी साथ काम करने वाले से अपने बच्चे के बारे में बात करते हैं. दौड़े दौड़े घर आते हैं और ऐसा लगता है दिल फिरसे धाड़कना शुरू हो गया.


एक माँ का जीवन उतना आसान नही होता, चाहे वो घर में रह कर सब संभालती है, चाहे वो बाहर जाकर काम करती है. अगर कोई माँ आपसे कुछ पूछे, या सिर्फ़ मन की कोई बात बोले तो उसे आँकें नही. उसकी बात सुने, कभी कभी वो बस बात करना चाहती है. हो सकता है आप उसकी सोच से सहमत ना हो, सलाह दें पर उस माँ के प्यार को ना आँकें. आँकना है तो उसकी परिस्थिति को, आँकना है तो आँकें उसकी तकलीफ़ को.

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