मेरी छोटी सी सहेली, मेरी बेटी

नन्ही सी गुड़िया मेरे घर आई थी,
कच्ची उंगलियाँ, रूई सा स्पर्श,
हल्की इतनी जैसे कोमल कोई फूल,
बचा बचा कर पकड़ती थी, के कहीं हो जाए ना भूल,
दूध पिलाती, तो सीने से चिपकी रहती, ना जाने कब दूध पीते पीते सो जाती.
आँख खुलती तो मंध मंध मुस्कुराती, कभी ज़ोर ज़ोर से रोती,
पर मेरे गले लगती तो हमेशा चुप हो जाती.

कभी किसी के लिए मैं इतनी ज़रूरी तो नही थी!
के मेरे बिना सब थम सा ही जाएगा, पर मेरी गुड़िया ने तो जैसे मुझे मेरी ही कीमत महसूस करा दी.
पहली बार महसूस हुआ की मैं भी ज़रूरी हूँ, मैं भी कुछ हूँ, क्यूकी मैं उसकी माँ हूँ.
उसी ने आकर एहसास कराया के मेरी माँ भी मुझे कितना प्यार करती हैं,
उसी ने आकर एहसास कराया की अब जीवन में एक बड़ा लक्ष्य है,
कभी उसे बैठना सिखाया, और फिर चलना, फिर दौड़ना, फिर लिखना, अब पढ़ना…
हर दिन एक नयी चीज़ सिखाती हूँ, पर कभी नही भूलती उसके साथ खेलना.

अब ना कोई सहेली चाहिए ना कोई दोस्त, शॉपिंग को भी हम माँ बेटी साथ जाते हैं,
चाहे कुछ भी पहनूं, बड़ी बड़ी आँखों से मुझे टुकूर टुकूर देखती है,
फिर ज़ोर से ताली बजाती है, ‘मम्मी आप सबसे सुंदर हो.’
क्या मांगू भगवान से अपने लिए, सब कुछ तो मिल गया, मेरी बेटी की मुस्कान में.
बस उसकी खुशी मांगती हूँ, उसके सब सपने पूरे करने हैं बस यही जानती हूँ.

जल्दी जल्दी बड़ी हो रही है, मेरी छोटी सी सहेली.
कल खूब दोस्त बनेंगे, तब शायद मुझे भूल जाएगी,
जीवन की दौड़ में शायद मुझसे दूर हो जाएगी,
नये नये दोस्त बनाएगी मेरी छोटी सी सहेली.
पर प्यार तो मुझे ही सबसे ज़्यादा करेगी, मेरी छोटी सी सहेली, मेरी बेटी.

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