पागल है मेरी गुड़िया

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बेटी को परी के जैसे पाला, सॅंजो के रखा, दुनिया से बचाया और खुद के लिए लड़ना सिखाया. हर दिन उसके साथ जिया और पता नही कब वो बड़ी हो गयी. अभी कल ही तो एल के जी में अड्मिशन कराया था, नयी यूनिफॉर्म लाया था, दो छोटी छोटी चोटी बनाकर स्कूल छोड़ के आया था.
आज ऑफीस जाती है, जीवन साथी भी चुन लिया. क्यूँ इतनी जल्दी है ना जाने उसे बड़ा होने की. क्यूँ इतनी जल्दी है मुझे छोड़ के जाने की. नाराज़ होना चाहता हूँ पर हो नही पा रहा. उसके चेहरे की मुस्कान मुझे नाराज़ नही होने देती. अभी ऑफीस से आएगी और बोलेगी, ‘पापा, मम्मी ने घीया बनाया है, प्लीज़ पनीर ले आओ.’ थका हुआ तो मैं भी हूँ पर उसके लिए हर काम करूँगा. आज ऑफीस जाती है, कल ही तो मैं नयी गुड़िया दिलाकर लाया था.
पागल है मेरी बिटिया बिल्कुल, बिना बात के हस्ती है, लगातार बातें करती है. कभी कभी थक कर बोलता हूँ, ‘चुप हो जा मेरी माँ.’ पर नही वो कहाँ मानती है. बेटे को तो खूब डाँट लेता था, उसे तो आँखें भी नही दिखा पाता. ज़रा भी दिल दुख जाए तो मेरी गुड़िया की आँखें भर आती है. बस यही नही देख पाता.
शीशे के सामने इतराती है, नये नये कपड़े लाती है. पागल है मेरी बिटिया.
आज लड़के वाले आए, शादी का जोड़ा लेने जाना था. कितने लहंगे देखे, ये नही, वो नही, ये रंग नही, पागल लड़की को पता ही नही के हर रंग उस पर जचता है, हर रंग में परी लगती है. एक ल़हेंगा पसंद आया, पहेन के दिखाने आई. कैसे अपने आँसू छुपाए, मैं ही जानता हूँ, पागल सी मेरी गुड़िया, कल तक चुननी से साड़ी बनाती थी आज ल़हेंगा पहेन के आ गयी. सबसे पहले मुझसे पूछा, ‘पापा ये कैसा है.’ खुद को संभाल के मैने बोला, ‘बहुत बढ़िया.’ कैसे बता दूं के खुश भी हूँ, उदास भी. कल तक आकर मेरी गोदी में सिर रख देती थी, ‘पापा सिर दबा दो प्लीज़.’ आज आ गयी ल़हेंगा पहेन के दुल्हन बन के. कैसे संभालूँगा खुद को जब सच में विदाई होगी.
क्या पता वहाँ कोई वो लाड लड़ायगा भी के नही. कहीं कोई उसका दिल दुखा देगा तो बताएगी भी नही, पागल है मेरी गुड़िया, सोचेगी पापा परेशान हो जाएँगे.
आज शादी है उसकी, कैसे दे दूं अंजान लोगों के हाथ में. हे इश्वर मेरी गुड़िया का ध्यान रखना. मेरे कलेजे का टुकड़ा है, जान से भी प्यारी है.

शादी के जिस जोड़े में भेजा था, आज उसी लाल रंग की आँखें हो रखी है उसकी. सोचा अचानक जाकर सर्प्राइज़ देता हूँ. आँखें लाल सूजी हुई, लगा बहुत रोई है. पूछा तो बोली इन्फेक्षन हो गया. पागल है मेरी गुड़िया, जानती नही के उसके पापा को सब पता है.
जी किया सीने से लगा लूँ और बोलूं, ‘के चल मेरी बिटिया, तुझे रोने नही दूँगा.’ पर रुक गया , बोली, ‘सब ठीक है पापा. छोटी मोटी बातें.’
कुछ दिन बाद घर आई, अब ज़्यादा बोलती नही, हँसती है पर उस हँसी के पीछे कुछ छुपति है. शीशे के आगे इतराती नही, बोलती है, ‘पापा अब बड़ी हो गयी हूँ.’
कैसे बता दूं उसे के मेरे लिए कभी बड़ी नही होगी मेरी रानी बेटी. अपनी मम्मी को बताती है पर मुझसे छुपति है. पागल है मेरी गुड़िया.

6 thoughts on “पागल है मेरी गुड़िया

  1. U hv Nicely described all d feelings a girl n her parents goes thrugh ..it made me recall evrythng since childhood n 😭😭

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